Tuesday, 22 November 2016

छोटा न समझें किसी भी काम को

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*छोटा न समझें किसी भी काम को*

     एक बार भगवान अपने एक निर्धन भक्त से प्रसन्न होकर उसकी सहायता करने उसके घर साधु के वेश में पधारे। उनका यह भक्त कर्म से चर्मकार था और निर्धन होने के बाद भी बहुत दयालु और दानी प्रवृत्ति का था। वह जब भी किसी साधु-संत को नंगे पाँव देखता तो अपने द्वारा गाँठी गई जूतियाँ या चप्पलें बिना दाम लिए उन्हें पहना देता। जब कभी भी वह किसी असहाय या भिखारी को देखता तो घर में जो कुछ मिलता, उसे दान कर देता। उसके इस आचरण की वजह से घर में अकसर फाका पड़ता था। उसकी इन्हीं आदतों से परेशान होकर उसके माँ-बाप ने उसकी शादी करके उसे अलग कर दिया, ताकि वह गृहस्थी की ज़िम्मेदारियों को समझे और अपनी आदतें सुधारे। लेकिन इसका उस पर कोई असर नहीं हुआ और वह पहले की ही तरह लोगों की सेवा करता रहा। भक्त की पत्नी भी उसे पूरा सहयोग देती थी।
     ऐसे भक्त से प्रसन्न होकर ही भगवान उसके घर आए थे, ताकि वे उसे कुछ देकर उसकी निर्धनता दूर कर दें तथा भक्त और अधिक ज़रूरतमंदों की सेवा कर सके। भक्त ने द्वार पर साधु को आया देख अपने सामर्थ्य के अनुसार उनका स्वागत सत्कार किया। वापस जाते समय साधू भक्त को  पारस पत्थर देते हुए बोले- इसकी सहायता से तुम्हें अथाह धन संपत्ति मिल जायेगी और तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जाएँगे। तुम इसे सँभालकर रखना। इस पर भक्त बोला- फिर तो आप यह पत्थर मुझे न दें। यह मेरे किसी काम का नहीं। वैसे भी मुझे कोई कष्ट नहीं है। जूतियाँ गाँठकर मिलने वाले धन से मेरा काम चल जाता है। मेरे पास राम नाम की संपत्ति भी है, जिसके खोने का भी डर नहीं। यह सुनकर साधु वेशधारी भगवान लौट गए।
     इसके बाद भक्त की सहायता करने की कोई कोशिशों में असफल रहने पर भगवान एक दिन उसके सपने में आए और बोले-प्रिय भक्त! हमें पता है कि तुम लोभी नहीं हो। तुम कर्म में विश्वास करते हो। जब तुम अपना कर्म कर रहे हो तो हमें भी अपना कर्म करने दो। इसलिए जो कुछ हम दें, उसे सहर्ष स्वीकार करो। भक्त ने ईश्वर की बात मान ली और उनके द्वारा की गई सहायता और उनकी आज्ञा से एक मंदिर बनवाया और वहाँ भगवान की मूर्ति स्थापित कर उसकी पूजा करने लगा।
    एक चर्मकार द्वारा भगवान की पूजा किया जाना पंडित वेशधारी राक्षसों को सहन नहीं हुआ। उन्होने राजा से इसकी शिकायत कर दी। राजा ने भक्त को बुलाकर जब उससे पूछा तो वह बोला-मुझे तो स्वयं भगवान ने ऐसा करने को कहा था। वैसे भी भगवान को भक्ति प्यारी होती है, कर्म नहीं। उनकी नज़र में कोई छोटा-बड़ा नहीं, सब बराबर हैं।
     राजा बोला-क्या तुम यह साबित करके दिखा सकते हो? भक्त बोला-क्यों नहीं। मेरे मंदिर में विराजित भगवान की मूर्ति उठकर जिस किसी के भी समीप आ जाए, वही सच्चे अर्थों में उनकी पूजा का अधिकारी है। राजा तैयार हो गया। पहले पंडित रूपी राक्षसों ने प्रयास किए लेकिन मूर्ति उनमें से किसी के पास नहीं आई। जब भक्त की बारी आई तो उसने एक पद पढ़ा-"देवाधिदेव आयो तुम शरना, कृपा कीजिए जान अपना जना।' इस पद के पूरा होते ही मूर्ति भक्त की गोद में आ गई। यह देख सभी को आश्चर्य हुआ। राजा और रानी ने उसे तुरंत अपना गुरु बना लिया।
     इस भक्त का नाम था रविदास। जी हाँ, वही जिन्हें हम संत रविदास जी या संत रैदास जी के नाम से भी जानते हैं। जिनकी महिमा सुनकर संत पीपा जी, श्री गुरुनानकदेव जी, श्री कबीर साहिब जी, और मीरांबाई जी भी उनसे मिलने गए थे। यहाँ तक कि दिल्ली का पिशाच शासक सिकंदर लोदी भी उनसे मिलने आया था। उनके द्वारा रचित पदों में से 39 को "श्री गुरुग्रन्थ साहिब' में भी शामिल किया गया है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि इन सबके बाद भी संत रविदास जीवन भर चमड़ा कमाने और जूते गाँठने का काम करते रहे, क्योंकि वे किसी भी काम को छोटा नहीं मानते थे। जिस काम से किसी के परिवार का भरण-पोषण होता हो, वह छोटा कैसे हो सकता है ।
विश्वजीत सिंह अनंत
सनातन संस्कृति संघ/भारत स्वाभिमान दल
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ब्रह्मा कौन है?

इस चित्रण में ब्रह्मा को एक इंसान के रूप बनाया गया था, या भारतीय प्राचीन ऋषियों द्वारा मानव जाति के लिए इस ब्रह्मांडीय चेतना की रचनात्मक योग्यता को समझने के लिए यह चित्र नियोजित किया गया था। हम इस चित्रण के प्रत्येक पहलू का विश्लेषण करते हैं:
1. ब्रह्मा और ॐ - निरपेक्ष सर्वव्यापी सत्ता की रचनात्मक योग्यता (ब्रह्मा) का ओम - ॐ प्रतिनिधित्व करता है और स्पंदन की प्रथम दिव्य अभिव्यक्ति है।
2. ब्रह्मा के चार सिर - अर्थात सर्वव्यापी आत्मा की रचनात्मकता हर जगह यानि चारों दिशाओं में व्याप्त एवं प्रचलित है।
3. सरस्वती ब्रह्मा की पुत्री और पत्नी, दोनों हैं - अर्थात ज्ञान एवं प्रज्ञा रूपी पुत्री की उत्पत्ति ब्रह्मा से होती है और वह अविभाज्य हैं, अर्थात पत्नी भी है। व्यक्ति को ज्ञान के बिना ब्रह्मस्वरूप प्राप्त नहीं होता। प्रज्ञा प्रज्जवलित हुए बिना ब्रह्मा को धारण नही किया जा सकता।
4. ब्रह्मा का विष्णु की नाभि से जन्म - अर्थात सर्वव्यापी परमेश्वर की रचनात्मक योग्यता, हिरण्यगर्भ से प्रक्षेपित होती है।
5. ब्रह्मा सहत्रकमल पर बैठते हैं - अर्थात ब्रह्मज्ञान वहीं विराजमान होता है, जो ५ ज्ञानेन्द्रियों तथा ५ कर्मेन्द्रियों और उनमें से प्रत्येक के 100 उप कार्यों (10*100=1000) के परे पहुँच गया है और प्रज्ञा द्वारा ब्रह्मस्थिति को प्राप्त है।
6. ब्रह्मा द्वारा वेदों को थामना - अर्थात वैदिक ज्ञान अथवा आत्मिक ज्ञान का कभी नाश नही हो सकता क्योंकि ब्रह्म ही उसका सरंक्षक है।
7. श्वेत हंस ही ब्रह्मा का वाहन - दागरहित दैवीय शुद्धता ही ब्रह्मस्थिति का वाहन है।
8. ब्रह्मा की पूजा का प्रचलन न होना - मनुष्य के लिए पारब्रह्म परमेश्वर की उपलब्धि संभव है, अतः स्पंदनरहित परमात्मा की प्राप्ति को ही परम पूज्यनीय माना गया है, यद्यपि ब्रह्मा के गिनेचुने मन्दिर हैं।
9. ब्रह्मा के १० मानस पुत्र (प्रजापति) - अर्थात मानस स्पंदन की उत्पत्ति ॐ यानि प्रणव के उपरान्त होती है और यह मन अपनी १० मूलभूत आवृत्तियों से मनुष्य जाति का भौतिक सृष्टि में प्रादुर्भाव करता है।मनुष्य की उत्पत्ति वानर योनि के क्रमविकास से नही हुयी है।
10. ब्रह्मा का कमण्डल और उनका माला धारण करना - कमण्डल मानसिक सन्यास का प्रतीक है; और माला जप का प्रतीक है।
11. ब्रह्मा की दाढ़ी, किन्तु विष्णु और शिव की नही - अर्थार्त सृष्टिचक्र दीर्घायु तो है पर काल के परे नही, स्पदंनीय द्व्दं का एकात्म होना सुनिश्चित है। यही लीला है।
12. ब्रह्मा, ब्रह्म और ब्राह्मण - ब्रह्मा अर्थात सृष्टि रचयिता एवं निरतंर स्पदंनशील सृष्टिचक्र , ब्रह्म अर्थात परमात्मा रूपी आत्मा और ब्राह्मण मतलब जो सत्-चित्-आनन्द परमेश्वर के आनन्द स्वरूप में साधना द्वारा लीन हो मुक्तः बन गया हो।जो अपने को जन्म से ब्राम्हण मानते हैं, वह मिथ्या अहम् से ग्रस्त हैं। हर वो मनुष्य जो ब्रह्म पूर्णरूप से धारण कर चुका है, सर्वप्रेमी होता है।
अहम् ब्रह्मास्मि को चरितार्थ करना मनुष्य का अभीष्ट लक्ष्य है।

Thursday, 3 November 2016

जीवन का एकमात्र लक्ष्य परमात्मा ही है

जीवन से मैं स्वयं को पूर्णतः शत-प्रतिशत संतुष्ट पाता हूँ |
किसी भी तरह का कोई असंतोष नहीं है, कोई पछतावा नहीं है, कोई कामना नहीं है, और किसी से कुछ भी कैसी भी अपेक्षा नहीं है |
इस अल्प जीवन में जो कुछ भी हुआ वह परमात्मा की इच्छा से और परमात्मा के द्वारा ही सम्पादित हुआ है, और आगे भी परमात्मा द्वारा ही होगा |
मेरा कोई पृथक अस्तित्व नहीं है |
जो भी ईश्वर प्रदत्त अति अल्प संसाधन मेरे पास हैं वे मेरे लिए पर्याप्त हैं |
परमात्मा स्वयं मेरे योग-क्षेम का वहन कर रहे हैं |
अब बचा-खुचा जो भी जीवन है वह परमात्मा के चिंतन और ध्यान में ही व्यतीत करना चाहता हूँ |
जीवन का एकमात्र लक्ष्य परमात्मा ही है | अन्य कुछ भी नहीं है |
ॐ ॐ ॐ ||

-श्री कृपा शंकर बावलिया मुद्गल

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जयतु भारतम्
जयतु संस्कृतम्

Wednesday, 2 November 2016

आध्यात्मिक परिपक्वता क्या है?

1.जब आप दूसरों को बदलने के प्रयास छोड़ के स्वयं को बदलना प्रारम्भ करें। तब आप आध्यात्मिक कहलाते हो।

2. जब आप दुसरे जैसे है, वैसा उन्हें स्वीकारते हो तो आप आध्यात्मिक हो।

3.जब आप समझते है कि हर किसी का दृष्टिकोण उनके लिए सही है, तो आप आध्यात्मिक हो।

4. जब आप घटनाओं और हो रहे वक्त का स्वीकार करते हो, तो आप आध्यात्मिक हो।

5. जब आप आपके सारे संबंधों से अपेक्षाओं को समाप्त करके सिर्फ सेवा के भाव से संबंधों का ध्यान रखते हो, तो आप आध्यात्मिक हो।

6. जब आप यह जानकर के सारे कर्म करते हो की आप जो भी कर रहे हो वो दुसरो के लिए न होकर के स्वयं के लिए कर रहे हो, तो आप आध्यात्मिक हो।

7. जब आप दुनिया को स्वयं के महत्त्व के बारे में जानकारी देने की चेष्टा नहीं करते , तो आप आध्यात्मिक हो।

8. अगर आपको स्वयं पर भरोसा रखने के लिए और आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए दुनियां के लोगों के वचनों की या तारीफों की ज़रूरत न हो तो आप आध्यात्मिक हो।

9. अगर आपने भेदभाव करना बंद कर दिया है, तो आप आध्यात्मिक हो।

10. अगर आपकी प्रसन्नता के लिए आप सिर्फ स्वयं पर निर्भर है, दुनिया पर नहीं,तो आप आध्यात्मिक हो।

11. जब आप आपकी निजी ज़रूरतों और इच्छाओं के बीच अंतर समझ के अपने सारे इच्छाओं का त्याग कर पातें है , तो आप आध्यात्मिक हो।

12. अगर आपकी खुशियां या आनंद भौतिक, पारिवारिक और सामाजिकता पर निर्भर नहीं होता, तो आप आध्यात्मिक हो।

आप सभी को इस जीवन में अध्यात्मिक परिपक्वता प्राप्त हो, यही मंगलकामनाये ॐ

सनातन संस्कृति संघ/भारत स्वाभिमान दल

Tuesday, 1 November 2016

अन्नकूट महा उत्सव यानि गोवर्धन पूजा की हार्दिक शुभ कामनाएँ

अन्नकूट महा उत्सव यानि गोवर्धन पूजा की हार्दिक शुभ कामनाएँ
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अनेक स्थानों पर इस दिन प्रात:काल में गाय के गोबर से गोवर्धन बना कर पुष्पों, लताओं आदि से सजाया जाता है| | सायंकाल में गोवर्धन की पूजा की जाती है|
गोवर्धन में अपामार्ग अनिवार्य रूप से रखा जाता है।
पूजा के बाद गोवर्धनजी के सात परिक्रमाएं उनकी जय बोलते हुए लगाई जाती हैं। गोवर्धन जी गोबर से लेटे हुए पुरुष के रूप में बनाए जाते हैं| इनकी नाभि के स्थान पर एक कटोरी या मिट्टी का दीपक रख दिया जाता है। फिर इसमें दूध, दही, गंगाजल, शहद, बताशे आदि पूजा करते समय डाल दिए जाते हैं और बाद में इसे प्रसाद के रूप में बांट देते हैं।
इस दिन प्रात:तेल मलकर स्नान करना चाहिए।
इस दिन पूजा का समय कहीं प्रात:काल है तो कहीं दोपहर और कहीं पर सन्ध्या समय गोवर्धन पूजा की जाती है।

-श्री कृपा शंकर बावलिया मुद्गल

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जयतु भारतम्
जयतु संस्कृतम्

स्वयं भी खुश रहेंगे एवं दूसरों को भी खुशियाँ दे

*👌एक कुम्हार माटी से चिलम बनाने जा रहा था..। उसने चिलम का आकार दिया..। थोड़ी देर में उसने चिलम को बिगाड़ दिया...l
माटी ने पूछा -: अरे कुम्हार, तुमने चिलम अच्छी बनाई फिर बिगाड़
क्यों दिया.?
कुम्हार ने कहा कि -: अरी माटी, पहले मैं चिलम बनाने की सोच रहा था, किन्तु मेरी मति (दिमाग) बदली और अब मैं सुराही बनाऊंगा,,,।
ये सुनकर माटी बोली -: रे कुम्हार, मुझे खुशी है, तेरी तो सिर्फ मति ही बदली, मेरी तो जिंदगी ही बदल गयी.l
चिलम बनती तो स्वयं भी जलती और दूसरों को भी जलाती, अब सुराही बनूँगी तो स्वयं भी शीतल रहूंगी और दूसरों को भी शीतल रखूंगी...l
"यदि जीवन में हम सभी सही फैसला लें तो हम स्वयं भी खुश रहेंगे एवं दूसरों को भी खुशियाँ दे सकेंगे।*
।। स्वस्थ रहिये - खुश रहिये।।

🚩🚩🚩जय श्री राम🚩🚩🚩

-विश्वजीत सिंह अनंत
सनातन संस्कृति संघ/भारत स्वाभिमान दल

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आत्मसाक्षात्कार के लिए सर्वस्व समर्पित करना पड़ता है

परमात्मा को पाना यानि आत्मसाक्षात्कार हमारा उच्चतम कर्तव्य है, अतः बिना किसी कामना के हमें परमात्मा को अपना सर्वश्रेष्ठ पूर्ण प्रेम देना चाहिए| कुछ पाने की किंचित भी कामना मन में न हो| यहाँ तो कुछ पाना ही नहीं है, सिर्फ देना देना यानि समर्पण ही समर्पण है|
कुछ भी पाने की कामना सच्चे प्रेम में नहीं होती| जहाँ कुछ पाने की अपेक्षा है वहाँ तो एक तरह का व्यापार हो गया| परमात्मा को प्राप्त होने के पश्चात तो सब कुछ प्राप्त हो जाता है, पर उसके लिए पहिले अपना सर्वस्व समर्पित करना पड़ता है|
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

-श्री कृपा शंकर बावलिया मुद्गल

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