Monday, 11 September 2017

सनातन संस्कृति संघ ट्रस्ट का संस्कृति संवर्धन अभियान


सनातन संस्कृति संघ ट्रस्ट का संस्कृति संवर्धन अभियान


यज्ञ महात्म्य- यज्ञो वै प्रजापति:  सहयज्ञा: प्रजा: सृष्टवा पुरोवाच प्रजापति: ।
अनेन प्रसविष्यध्व मेष वोदस्त्विष्ट कामधुक ।।

प्रजापिता ब्रह्मा ने सृष्टि के प्रारंभ में यज्ञ सहित प्रजाओं की सृष्टि उत्पन्न कर उनसे कहा तुम लोग यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्त हो। और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित कामनाओं का देने वाला हो।

यज्ञ का तात्पर्य है- त्याग, बलिदान, शुभ कर्म। अपने प्रिय खाद्य पदार्थों एवं मूल्यवान् सुगंधित पौष्टिक द्रव्यों को अग्नि एवं वायु के माध्यम से समस्त संसार के कल्याण के लिए यज्ञ द्वारा वितरित किया जाता है। वायु शोधन से सबको आरोग्यवर्धक साँस लेने का अवसर मिलता है। हवन हुए पदार्थ वायुभूत होकर प्राणिमात्र को प्राप्त होते हैं और उनके स्वास्थ्यवर्धन, रोग निवारण में सहायक होते हैं। यज्ञ काल में उच्चरित वेद मंत्रों की पवित्र शब्द ध्वनि आकाश में व्याप्त होकर लोगों के अंतःकरण को सात्विक एवं शुद्ध बनाती है। इस प्रकार थोड़े ही खर्च एवं प्रयत्न से यज्ञकर्ताओं द्वारा संसार की बड़ी सेवा बन पड़ती है।

अग्नौ प्रस्ताहुति: सम्यक आदित्यमुपतिष्ठते । 
आदित्या जायते वृष्टि: वृष्ठे अन्नं तत: प्रजा ।।

विधिपूर्वक अग्नि में छोडी हुई आहूती सूर्य को प्राप्त होती है। सूर्य से वृष्टि तथा वृष्टि से अन्न और अन्न से प्रजायें उत्पन्न होती है। इस प्रकार वृष्टि, अन्न और प्रजाओं की उत्पत्ति का मूल कारण हवन ही है। अत: यज्ञ करना परम आवश्यक है। 

यज्ञ कर्म को मनुष्यों और देवताओं के परस्पर कल्याण हेतु होना आवश्यक है क्यूंकि देवताओं को भोजन यज्ञ से प्राप्त होता है और मनुष्य को सर्वाभीष्ट देने वाले देवता लोग भी तुम पर प्रसन्न होकर तुम्हारा कल्याण करें।

यज्ञो हि भगवान विष्णु: भगवान सर्वयज्ञभुक।

भगवान विष्णु यज्ञ स्वरूप यज्ञ भोक्ता व यज्ञ से ही प्रकट हुये है तथा यज्ञ में उनका ही यजन पूजन होता है।

यज्ञो वै श्रेष्ठतम् कर्म:।

यज्ञ श्रेष्ठतम् कर्म है। यज्ञ मानव शक्ति के अपव्यय को रोकता है और श्रेष्ठ शक्ति देता है। अयं यज्ञो भुवनष्य नाभि:। यज्ञ का फल इहलोकिक व पारलोकिक दोनों में प्राप्त होता है अत: यज्ञ समस्त भुवनों का स्वामी है।

सर्व यज्ञ मयं जगत यज् धातो देवपूजा, संगतिकरण दानेषु ।

यजुर्वेद में यज्ञ के बारे में कहा है : यज्ञ से अशुद्ध तत्वों का नाश होता है। यज्ञ से दिव्य वातावरण की उत्पत्ति होती है। यज्ञ से आंतरिक शत्रुओं का नाश होता है। यज्ञ से असुरों का नाश होता है। यज्ञ वीरता दायक एवं कायरता विनाशक है। यज्ञ देवताओं और मनुष्यों को अपने प्रति किये गये जाने या अजाने पापों से बचाने वाला है। यज्ञ से आत्मबल की वृद्धि होती है। यज्ञ से सद् बुद्धि की प्राप्ति होती है।

यज्ञ अनेक प्रकार के हुआ करते है - चतुर्वेद पारायण यज्ञ, विष्णु यज्ञ, रूद्र यज्ञ, दुर्गा यज्ञ, लक्ष्मी यज्ञ, गायत्री यज्ञ, महामृत्युंजय यज्ञ आदि। यज्ञ देवत्व के पोषण के लिए तथा अनिष्ठ नाश, आयु- आरोग्य की वृद्धि, भगवान की भक्ति, विश्व शान्ति, जन कल्याण, वातावरण की शुद्धि, तीनों ताप व पाप के क्षयार्थ एवं मुक्ति के लिये किये जाते है।

प्रकृति का स्वभाव यज्ञ परंपरा के अनुरूप है। सृष्टि का उद्भव विकास एवं अनन्त गतिविधियां सब यज्ञ में है। हम जो कुछ भी परहित से प्रेरित होकर कार्य करते है, वह यज्ञ की श्रेणी में आते है। जैसे पशु पक्षियों को चारा डालना, सुपात्र प्राणियों को भोजन, वस्त्र एवम दक्षिणा प्रदान करना, सनातन धर्म पर चलने वाले निर्धन व्यक्तियों की कन्याओं का विवाह आयोजित करवाना, सनातन धर्म के गरीब मेधावी बच्चों को छात्रवृत्तियाँ प्रदान करना, बीमारी के अवसर पर चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराना, अकस्मात आपदा आने पर जैसे भूकंप, बाढ़ आदि कार्यों में सहायता करना, धर्म व सत्प्रवृति के सम्वर्द्धन के लिए बाल संस्कार शालाओं, पुस्तकालयों, विद्याकुलों, गुरूकुलों की स्थापना कराना, गौशालाओं में चारा आदि का दान करना तथा सनातन धर्म की रक्षा व सम्वर्द्धन में लगे संगठनों को शारीरिक व आर्थिक सहयोग प्रदान करना। ये सब यज्ञ की श्रेणी में आते है।

राष्ट्र की समस्याओं के समाधान, आध्यात्मिक, अधि दैविक, अधि भौतिक तीनों तापों की निवृत्ति के लिये तथा संक्रामक रोगों की निवृत्ति, शारीरिक- मानसिक रोगों का नाश, पापों व कष्टों की निवृत्ति के लिए सनातन संस्कृति संघ (ट्रस्ट) इस प्रकार के यज्ञों का आयोजन निरन्तर करता- कराता रहता है। इन आयोजनों से मनुष्य स्वास्थ्य, समृद्धि व परम पद को प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त विभिन्न स्थानों पर सुन्दरकाण्ड, संकीर्तन व सत्संग आदि का आयोजन कराया जा रहा है तथा परमात्मा की कृपा से भविष्य में भी कराया जाता रहेगा।

सनातन संस्कृति संघ (ट्रस्ट) संसार के जनकल्याणार्थ, मानवीय, नैतिक,सांस्कृतिक,वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों को निजी, व्यवसायिक तथा सार्वजनिक जीवन में बढ़ावा देने के लिये कार्यरत है। इन सभी परमार्थिक कार्यो में सहभागी बनकर तन- मन- धन से सहयोग करने वालों को आरोग्यता, विद्या, कीर्ति,पराक्रम, धन- धान्य और पुत्र- पौत्रादि अनेक प्रकार के ऐश्वर्यो की प्राप्ति होगी इसी आशा से-                                             

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:  
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु माकश्चिद दु:ख भाग् भवेत् ।।

सम्पर्क करें 9149105534
वन्दे मातरम्
भारत माता की जय
सनातन संस्कृति संघ (ट्रस्ट) परिचय
सनातन संस्कृति संघ का संदेश गौहत्या मुक्त हो भारत देश 

सनातन संस्कृति संघ (ट्रस्ट) परिचय

शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, स्वावलंबन, नारी जागरण, पर्यावरण, व्यसन एवं कुरीति उन्मूलन के लिए कार्यरत ट्रस्ट
 


सनातन संस्कृति संघ एक गैर सरकारी, सामाजिक, स्वयंसेवी ट्रस्ट हैं। इसका मुख्य उद्देश्य शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, स्वावलंबन, नारी जागरण, पर्यावरण, व्यसन एवं कुरीति उन्मूलन के कार्य करना है।

संसार के जन कल्याणार्थ मानवीय, नैतिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों को निजी, व्यवसायिक तथा सार्वजनिक जीवन में बढ़ावा देना। गौशालाओं एवं गुरूकुलों की स्थापना व संचालन करना। यह संस्था जिन क्षेत्रों में शिक्षायें एवं प्रशिक्षण दे रही है, वे हैं-

राष्ट्र जागरण, स्वदेशी स्वाभिमान, मूल्यनिष्ठ शिक्षा, चरित्र निर्माण, योग प्रशिक्षण, आपदा प्रबंधन, विश्व बंधुत्व, सम्पूर्ण स्वास्थ्य, गौवंश एवं ग्राम आधारित अर्थतंत्र की व्यवस्था, पर्यावरण प्रदूषण के प्रति जागृति, व्यक्तित्व विकास, महिला सशक्तिकरण, सामाजिक पुनर्निर्माण, नशीले पदार्थो से मुक्ति, अंधविश्वास एवं कुप्रथा निवारण, सकारात्मक चिंतन, वैज्ञानिक- आध्यात्मिक अनुभूति तथा जीने की कला।

सनातन संस्कृति संघ को दिये गये दान पर आयकर की धारा 80G के अंतर्गत टैक्स में छूट प्राप्त की जा सकती हैं।

सनातन संस्कृति संघ (ट्रस्ट) को अंशदान देने के इच्छुक दानदाता पंजाब नेशनल बैंक की स्थानीय सी0बी0एस0 शाखा में पहुंचकर

खाता संख्या A/C no :- 4579002100002930
IFSC - PUNB 0457900
Branch Code 457900  में अपना अंशदान जमा कर सकते है।

<> खाते में धन जमा करवाते समय खाते का नाम एवं शाखा का स्थान (सनातन संस्कृति संघ, पंजाब नैशनल बैंक, करावल नगर, दिल्ली) अवश्य जाँच कर ले।

अधिक जानकारी हेतु हमसे 09149105534  पर सम्पर्क कर सकते है।

वन्दे मातरम्
भारत माता की जय
सनातन संस्कृति संघ का संदेश गौहत्या मुक्त हो भारत देश 
सनातन संस्कृति संघ ट्रस्ट का संस्कृति संवर्धन अभियान

ॐ शिवोहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि



भगवान को समर्पित होने पर
सबसे पहिले तो हम जाति विहीन हो जाते हैं,
फिर वर्ण विहीन हो जाते हैं,
घर से भी बेघर हो जाते हैं,
देह की चेतना भी छुट जाती है
और मोक्ष की कामना भी नष्ट हो जाती है
विवाह के बाद कन्या अपनी जाति, गौत्र और वर्ण
सब अपने पति की जाति, गौत्र और वर्ण में मिला देती है
पति की इच्छा ही उसकी इच्छा हो जाती है
वैसे ही भगवान को समर्पित होने के बाद हमारी जाति आदि क्या होंगे ?
भगवान् की जाति क्या है ?
भगवान् का वर्ण क्या है ?
भगवान् का घर कहाँ है ?
हम कौन हैं ?
इन सब प्रश्नों के उत्तर जिज्ञासु लोग सोचें
मेरे लिए तो ये सब महत्वहीन हैं
पर एक बात तो है कि जो कुछ भी परमात्मा का है
सर्वज्ञता, सर्वव्यापकता, सर्वशक्तिमता आदि आदि
उन सब पर हमारा भी जन्मसिद्ध अधिकार है
हम उनसे पृथक नहीं हैं
जो भगवान की जाति है वह ही हमारी जाति है
जो उनका घर है वह ही हमारा घर है
जो उनकी इच्छा है वह ही हमारी इच्छा है
Thou and I art one.
Reveal Thyself unto me.
Make me a perfect child of Thee.
तुम महासागर हो तो मैं जल की एक बूँद हूँ
जो तुम्हारे में मिलकर महासागर ही बन जाती है
तुम एक प्रवाह हो तो मैं एक कण हूँ
जो तुम्हारे में मिलकर विराट प्रवाह बन जाता है
तुम अनंतता हो तो मैं भी अनंत हूँ
तुम सर्वव्यापी हो तो मैं भी सदा तुम्हारे साथ हूँ
जो तुम हो वह ही मैं हूँ मेरा कोई पृथक अस्तित्व नहीं है
मैं तुम्हारा अमृतपुत्र हूँ, तुम और मैं एक हैं
I am the polestar of my shipwrecked thoughts .....
मैं ध्रुव तारा हूँ मेरे ही विखंडित विचारों का,
मैं पथ-प्रदर्शक हूँ स्वयं के भूले हुए मार्ग का.
मैं अनंत, मेरे विचार अनंत,
मेरी चेतना अनंत और मेरा अस्तित्व अनंत.
मेरा केंद्र है सर्वत्र,
परिधि कहीं भी नहीं.
मेरे उस केंद्र में ही मैं स्वयं को खोजता हूँ,
बस यही मेरा परिचय है.
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ॐ शिवोहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि ।। ॐ ॐ ॐ ।।
ॐ शिव ।। ॐ तत्सत् ।। ॐ ॐ ॐ ।।
- विश्वजीत सिंह "अभिनव अनंत"
सनातन संस्कृति संघ/भारत स्वाभिमान दल