Saturday, 1 October 2016

माँ कूष्मांडा

भगवती माँ दुर्गा जी के चौथे स्वरुप का नाम कूष्मांडा है. देवी कूष्माण्डा अपनी मन्द मुस्कान से अण्ड अर्थात ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा देवी के नाम से जाना जाता है। मां कूष्मांडा वही हैं जो पूरे ब्रह्मांड को खुद निंयत्रित करती हैं। यह तब से हैं जब पूरी द‍ुनिया पर अंधकार का कब्‍जा था। तब इन्‍होंने अपनी मुस्‍कान की छटा बिखेरी और पूरी दुनिया में रौशनी ही रौशनी भर उठी।

यह वही हैं जो सूरज को इतनी शक्‍ति देती हैं कि वह चमक सके। इस देवी का वास सूर्यमंडल के भीतर लोक में है। सूर्यलोक में रहने की शक्ति क्षमता केवल इन्हीं में है। इसीलिए इनके शरीर की कांति और प्रभा सूर्य की भांति ही दैदीप्यमान है। इनके ही तेज से दसों दिशाएं आलोकित हैं। इन देवी की सवारी सिंह है और इन्‍हें कुम्हड़े की बलि बहुत प्रिय है। ये देवी अत्यल्प सेवा और भक्ति से ही प्रसन्न होकर आशीर्वाद देती हैं। सच्चे मन से पूजा करने वाले को सुगमता से परम पद प्राप्त होता है।

देवी कूष्मांडा अष्टभुजा से युक्त हैं अत: इन्हें देवी अष्टभुजा के नाम से भी जाना जाता है. देवी अपने इन हाथों में क्रमश: कमण्डलु, धनुष, बाण, कमल का फूल, अमृत से भरा कलश, चक्र तथा गदा है । देवी के आठवें हाथ में बिजरंके (कमल फूल का बीज) का माला है है, यह माला भक्तों को सभी प्रकार की ऋद्धि सिद्धि देने वाला है । देवी अपने प्रिय वाहन सिंह पर सवार हैं। जो भक्त श्रद्धा पूर्वक  देवी की उपासना दुर्गा पूजा के चौथे दिन करता है उसके सभी प्रकार के कष्ट रोग, शोक का अंत होता है और आयु एवं यश की प्राप्ति होती है।

संस्कृत भाषा में कूष्मांडा कुम्हड़े को कहते है ! बलियों में कुम्हड़े की बलि इन्हें सर्वाधिक प्रिय है ! इस कारण से भी कूष्मांडा कही जाती है |

माँ स्कंदमाता

नवरात्र के पांचवे दिन मां स्कंदमाता की पूजा होती है। मां के इस स्वरूप की पूजा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। मां भक्त के सारे दोष और पाप दूर कर देती है। माँ अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। भगवान स्कंद ‘कुमार कार्तिकेय’ नाम से भी जाने जाते हैं। ये प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे।

पुराणों में इन्हें कुमार और शक्ति कहकर इनकी महिमा का वर्णन किया गया है। इन्हीं भगवान स्कंद की माता होने के कारण माँ दुर्गाजी के इस स्वरूप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है। स्कंदमाता की चार भुजाएँ हैं। इनके दाहिनी तरफ की नीचे वाली भुजा, जो ऊपर की ओर उठी हुई है, उसमें कमल पुष्प है। बाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा में वरमुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी है उसमें भी कमल पुष्प ली हुई हैं। इनका वर्ण पूर्णतः शुभ्र है। ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। इसी कारण इन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है। सिंह भी इनका वाहन है। नवरात्रि-पूजन के पाँचवें दिन का शास्त्रों में पुष्कल महत्व बताया गया है। इस चक्र में अवस्थित मन वाले साधक की समस्त बाह्य क्रियाओं एवं चित्तवृत्तियों का लोप हो जाता है।

नवदुर्गा के पांचवे स्वरूप स्कंदमाता की अलसी औषधी के रूप में भी पूजा होती है। स्कंद माता को पार्वती एवं उमा के नाम से भी जाना जाता है। अलसी एक औषधि से जिससे वात, पित्त, कफ जैसी मौसमी रोग का इलाज होता है। इस औषधि को नवरात्रि में माता स्कंदमाता को चढ़ाने से मौसमी बीमारियां नहीं होती। साथ ही स्कंदमाता की आराधना के फल स्वरूप मन को शांति मिलती है।

माँ स्कंदमाता पापियों को भी क्षमा कर देती हैं यदि कोई पापी मां की शरण में पहुंचता है, तथा उसे अपने प्रेम के आंचल से ढ़क लेती है।

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ स्कंदमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

माँ स्कंदमाता का वाहन सिंह है इसलिये इस मंत्र के उच्चारण सहित माँ की आराधना की जाती है-

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

माँ कालरात्रि

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

माँ दुर्गाजी की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं। दुर्गापूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है। इस दिन साधक का मन ‘सहस्रार’ चक्र में स्थित रहता है। इसके लिए ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है। माँ कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है, लेकिन ये सदैव शुभ फल ही देने वाली हैं। इसी कारण इनका एक नाम ‘शुभंकारी’ भी है। अतः इनसे भक्तों को किसी प्रकार भी भयभीत अथवा आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है।

कालरात्रि की उत्पत्ति की कथा

कथा के अनुसार दैत्य शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था। इससे चिंतित होकर सभी देवतागण शिव जी के पास गए। शिव जी ने देवी पार्वती से राक्षसों का वध कर अपने भक्तों की रक्षा करने को कहा।

शिव जी की बात मानकर पार्वती जी ने दुर्गा का रूप धारण किया तथा शुंभ-निशुंभ का वध कर दिया। परंतु जैसे ही दुर्गा जी ने रक्तबीज को मारा उसके शरीर से निकले रक्त से लाखों रक्तबीज उत्पन्न हो गए। इसे देख दुर्गा जी ने अपने तेज से कालरात्रि को उत्पन्न किया।

इसके बाद जब दुर्गा जी ने रक्तबीज को मारा तो उसके शरीर से निकलने वाले रक्त को कालरात्रि ने अपने मुख में भर लिया और सबका गला काटते हुए रक्तबीज का वध कर दिया।

माँ महागौरी

माँ महागौरी को भगवान गणेश की माता के रूप में भी जाना जाता है|

नवरात्र के आठवें दिन मां महागौरी की आराधना की जाती है। आज के दिन मां की स्तुति से समस्त पापों का नाश होता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार मां ने कठिन तप कर गौरवर्ण प्राप्त किया था। मां की उत्पत्ति के समय इनकी आयु आठ वर्ष की थी जिस कारण इनका पूजन अष्टमी को किया जाता है। मां अपने भक्तों के लिए अन्नपूर्णा स्वरूप है। आज ही के दिन कन्याओं के पूजन का विधान है। मां धन वैभव, सुख शांति की अधिष्ठात्री देवी हैं। मां का स्वरूप ब्राह्मण को उज्जवल करने वाला तथा शंख, चन्द्र व कुंद के फूल के समान उज्जवल है। मां वृषभवाहिनी (बैल) शांति स्वरूपा है।

कहा जाता है कि मां ने शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया जिसके बाद उनका शरीर मिटटी ढक गया। आखिरकार भगवान महादेव उन पर प्रसन्न हुए और उन्हें पत्नी होने का आर्शीवाद प्रदान किया। भगवान शंकर ने इनके शरीर को गंगाजल से धोया जिसके बाद मां गौरी का शरीर विद्युत के समान गौर व दैदीप्यमान हो गया। इसी कारण इनका नाम महागौरी पड़ा।

महागौरी जी से संबंधित एक अन्य कथा भी प्रचलित है इसके जिसके अनुसार, एक सिंह काफी भूखा था, वह भोजन की तलाश में वहां पहुंचा जहां देवी उमा तपस्या कर रही होती हैं। देवी को देखकर सिंह की भूख बढ़ गयी परंतु वह देवी के तपस्या से उठने का इंतजार करते हुए वहीं बैठ गया। इस इंतजार में वह काफी कमज़ोर हो गया। देवी जब तप से उठी तो सिंह की दशा देखकर उन्हें उस पर बहुत दया आती है और माँ उसे अपना सवारी बना लेती हैं क्योंकि एक प्रकार से उसने भी तपस्या की थी। इसलिए देवी गौरी का वाहन बैल और सिंह दोनों ही हैं।

मां संगीत व गायन से प्रसन्न होती है तथा इनके पूजन में संगीत अवश्य होता है। कहा जाता है कि आज के दिन मां की आराधना सच्चे मन से होता तथा मां के स्वरूप में ही पृथ्वी पर आयी कन्याओं को भोजन करा उनका आर्शीवाद लेने से मां अपने भक्तों को आर्शीवाद अवश्य देती है। हिन्दू धर्म में अष्टiमी के दिन कन्याओं को भोजन कराए जाने की परम्परा है।

माता महागौरी, मां दुर्गा की अष्टम शक्ति है जिसकी आराधना करने से भक्तजनों को जीवन की सही राह का ज्ञान होता है और जिस पर चलकर लोग अपने जीवन का सार्थक बना सकते हैं। जो भी साधक नवरात्रि में माता के इस रूप की आराधना करते हैं माँ उनके समस्त पापों का नाश करती है। अस्टमी के दिन व्रत रहकर मां की पूजा करते हैं और उसे भोग लगाकर मां का प्रसाद ग्रहण करते हैं, इससे व्यक्ति के अन्दर के सारे दुष्प्रभाव नष्ट हो जाते हैं।

माँ सिद्धिदात्री

माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नवरात्र–पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। इस दिन शास्त्रीय विधि–विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है।

देवी सिद्धिदात्री का वाहन सिंह है। वह कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं विधि–विधान से नौंवे दिन इस देवी की उपासना करने से सिद्धियां प्राप्त होती हैं। यह अंतिम देवी हैं। इनकी साधना करने से लौकिक और परलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है।

भगवान शिव ने भी सिद्धिदात्री देवी की कृपा से तमाम सिद्धियां प्राप्त की थीं। इस देवी की कृपा से ही शिवजी का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण शिव अर्द्धनारीश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए।

मां के चरणों में शरणागत होकर हमें निरंतर नियमनिष्ठ रहकर उपासना करनी चाहिए। इस देवी का स्मरण, ध्यान, पूजन हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हैं और अमृत पद की ओर ले जाते हैं।

देवी पुराण में ऐसा उल्लेख मिलता है कि भगवान शंकर ने भी इन्हीं की कृपा से सिद्धियों को प्राप्त किया था। ये कमल पर आसीन हैं और केवल मानव ही नहीं बल्कि सिद्ध, गंधर्व, यक्ष, देवता और असुर सभी इनकी आराधना करते हैं। संसार में सभी वस्तुओं को सहज और सुलभता से प्राप्त करने के लिए नवरात्र के नवें दिन इनकी पूजा की जाती है। इनका स्वरुप मां सरस्वती का भी स्वरुप माना जाता है।

माँ शैलपुत्री

भगवती माँ दुर्गा अपने पहले स्वरुप में शैलपुत्री के नाम से जानी जाती हैं !

पर्वतराज हिमालय के यहाँ पुत्री के रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका शैलपुत्री नाम पड़ा था! वृषभ – स्थिता इन माता जी के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल पुष्प सुशोभित हैं ! यही नव दुर्गों में प्रथम दुर्गा हैं ! अपने पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थी !

तब इनका नाम ‘सती’ था ! इनका विवाह भगवन शंकर जी से हुआ था! एक बार प्रजापति दक्ष ने एक विसाल यज्ञ का आयोजन किया ! इस यज्ञ में उन्होंने सारे देवी देवताओं को अपना -२ यज्ञ भाग प्राप्त करने के लिए आमंत्रित किया ! किन्तु शंकर जी को उन्होंने इस यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया ! सती ने जब ये सुना की उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं , तब वहां जाने के लिए उनका मन व्याकुल हो उठा ! पानी यह इक्षा उन्होंने शंकर जी को बताई ! सारी बातो पर विचार करने के बाद शंकर जी ने कहा – प्रजापति दक्ष किसी कारण वश हमसे नाराज हैं !

अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवी देवताओं को आमंत्रित किया हैं! उनके यज्ञ भाग भी उन्हें समर्पित किये हैं , किन्तु हमे जान बूझ कर नहीं बुलाया हैं ! कोई सूचना तक नहीं भेजी हैं ! ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहां जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा ! शंकर जी के इस कथन से भी सती को प्रबोध नहीं हुआ !

पिता का यज्ञ देखने , वहां जाकर माता और बहनों से मिलने की व्याकुलता किसी प्रकार भी कम न हो सकी ! उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान् शंकर जी ने उन्हें वहां जाने की अनुमति दे दी ! सती ने पिता के घर पहुँच कर देखा की कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा ! केवल उनकी माँ ने स्नेह से उन्हें गले लगाया ! परिजनों के इस व्यवहार से उन्हें बहुत दुःख पंहुचा ! प्रजापति दक्ष ने भगवान् शंकर के प्रति अपमानजनक वचन भी कहे तथा भगवान् शंकर जी के लिए उनके ह्रदय में तिरस्कार का भाव भी भरा था!

यह सब देखकर सती का ह्रदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा ! उन्होंने सोचा भगवान् शंकर जी की बात न मान यहाँ आकर उन्होंने बहुत बड़ी गलती की हैं ! वह अपने पति भगवान् शंकर के इस अपमान को सहन न कर सकी ! उन्होंने अपने इस रूप को तत्क्षर वहीँ यागाग्नी में जला कर भस्म कर दिया ! वज्रपात के समान इस दारुण – दुखद घटना को सुनकर भगवान् शंकर ने क्रुद्ध होकर अपने गणों को भेज कर दक्ष के यज्ञ को पूर्णतया विध्वंश करा दिया ! सती ने योगाग्नी द्वारा शरीर को भष्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया ! इस बार वह ‘शैलपुत्री ‘ नाम से विख्यात हुई !

पार्वती तथा हेमवती भी उन्ही के नाम हैं ! ‘ शैलपुत्री ‘ देवी का विवाह भी भगवान् शंकर जी से हुआ ! नव दुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियां अनंत हैं ! नवरात्री पूजन में प्रथम दिवस में इन्ही की पूजा और उपासना की जाती हैं ! माता शैलपुत्री को नमन !

नवरात्रि या नवरात्र

नवरात्र का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक संबंध इन नौ से सीधा जुड़ा है ...
- हमारे शरीर म 9 इंद्रियाँ हैं -
आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा, वाक्, मन, बुद्धि, आत्मा।
- नौ ग्रह हैं जो हमारे सभी शुभ-अशुभ के कारक होते हैं -
बुध, शुक्र, चंद्र, बृहस्पति, सूर्य, मंगल, केतु, शनि, राहु।
- नौ उपनिषद हैं -
ईश, केन, कठ, प्रश्न, मूंडक, मांडूक्य, एतरेय, तैतिरीय, श्वेताश्वतर।
- नवदुर्गा यानी 9 देवियाँ हैं -
शैलपुत्री, ब्रम्हचारिणी, चंद्रघंटा, कुशमांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्री, महागौरी, सिद्धरात्री।
शरीर और आत्मा के सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुध्दि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है।
इनको व्यक्तिगत रूप से महत्व देने के लिए नौ दिन नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं।

सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुध्दि,
साफ सुथरे शरीर मे शुध्द बुद्धि,
उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म,
कर्मों से सच्चरित्रता और
क्रमश: मन शुध्द होता है।
स्वच्छ मन मंदिर मे ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है।
नवरात्र मे निम्न आहार को अधिक महत्व दिया गया है ,
जिसका सीधा सीधा संबंध हमारे स्वास्थ और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बड़ाने के लिए ही है -
1. कुट्टू - शैल पुत्री
2. दूध दही - ब्रह्म चारिणी
3. चौलाई - चंद्रघंटा
4. पेठा - कूष्माण्डा
5. श्यामक चावल - स्कन्दमाता
6. हरी तरकारी - कात्यायनी
7. काली मिर्च व तुलसी - कालरात्रि
8. साबूदाना - महागौरी
9. आंवला - सिध्दीदात्री !
अब जानते हैं कि नवरात्र को ' नवरात्र ' ही क्यूँ कहते हैं ?
क्योंकि ' रात्रि ' शब्द सिद्धि का प्रतीक माना जाता है।
भारत के प्राचीन ऋषि मुनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है।
यही कारण है कि दीपावली, होलिका, शिवरात्रि और नवरात्र आदि उत्सवों को रात मे ही मनाने की परंपरा है।
यदि, रात्रि का कोई विशेष रहस्य न होता तो ऐसे उत्सवों को रात्रि न कह कर दिन ही कहा जाता , जैसे नवदिन या शिवदिन
दिन मे आवाज दी जाए तो वह दूर तक नहीं जाएगी ... किंतु रात्रि को आवाज दी जाए तो वह बहुत दूर तक जाती है।
इसके पीछे ध्वनि प्रदूषण के अलावा एक वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि दिन मे सूर्य की किरणें आवाज की तरंगों और रेडियो तरंगों को आगे बढ़ने से रोक देती हैं।
रेडियो इस बात का जीता जागता उदाहरण है।
कम शक्ति के रेडियो स्टेशनों को दिन में पकड़ना अर्थात सुनना मुश्किल होता है , जबकि सूर्यास्त के बाद छोटे से छोटा रेडियो स्टेशन भी आसानी से सुना जा सकता है।
मनीषियों ने रात्रि के महत्व को अत्यंत सूक्ष्मता के साथ वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य मे समझने और समझाने का प्रयत्न किया।
रात्रि मे प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं।
आधुनिक विज्ञान भी इस बात से सहमत है।
हमारे ऋषि मुनि आज से कितने ही हजारों वर्ष पूर्व ही प्रकृति के इन वैज्ञानिक रहस्यों को जान चुके थे।

इसी वैज्ञानिक सिद्धांत के आधार पर मंत्र जप की विचार तरंगों में भी दिन के समय अवरोध रहता है ,
इसीलिए ऋषि मुनियों ने रात्रि का महत्व दिन की अपेक्षा बहुत अधिक बताया है।
इसी तथ्य को ध्यान मे रखते हुए , साधक गण रात्रि मे संकल्प और उच्च अवधारणा के साथ अपने शक्तिशाली विचार तरंगों को वायुमंडल में भेजते हैं ,
उनकी कार्यसिद्धि अर्थात मनोकामना सिद्धि , उनके शुभ संकल्प के अनुसार उचित समय और ठीक विधि के अनुसार करने पर अवश्य पूर्ण होती है।
सामान्यजन , दिन मे ही पूजा पाठ निपटा लेते हैं ,
जबकि एक साधक , इस अवसर की महत्ता जानता है और ध्यान , मंत्र जप आदि के लिए रात्रि का समय ही चुनता है।
नवरात्र से नवग्रहों का संबंध भी है ...

नवग्रह मे कोई भी ग्रह अनिष्ट फल देने जा रहा हो जो शक्ति उपासना करने से विशेष लाभ मिलता है।
- सूर्य ग्रह के कमजोर रहने पर स्वास्थ्य लाभ के लिए शैलपुत्री की उपासना से लाभ मिलती है।
- चंद्रमा के दुष्प्रभाव को दूर करने के कुष्मांडा देवी की विधि विधान से नवरात्रि मे साधना करें।
- मंगल ग्रह के दुष्प्रभाव से बचने के लिए स्कंदमाता,
- बुध ग्रह की शांति तथा अर्थव्यवस्था मे वृद्धि के लिए कात्यायनी देवी,
- गुरु ग्रह के अनुकूलता के लिए महागौरी,
- शुक्र के शुभत्व के लिए सिद्धिदात्रि तथा
- शनि के दुष्प्रभाव को दूर कर शुभता पाने के लिए कालरात्रि के उपासना सार्थक रहती है।
- राहु की शुभता प्राप्त करने के लिए ब्रह्माचारिणी की उपासना करनी चाहिए।
- केतु के विपरीत प्रभाव को दूर करने के लिए चंद्रघंटा की साधना अनुकूलता देती है।
नवरात्र वर्ष मे चार बार आते है , जिसमे चैत्र और आश्विन की नवरात्रियों का विशेष महत्व है।
चैत्र नवरात्र से ही विक्रम संवत का आरंभ होता है...
इन दिनों प्रकृति से एक विशेष तरह की शक्ति निकलती है।
इस शक्ति को ग्रहण करने के लिए इन दिनों में शक्ति पूजा या नवदुर्गा की पूजा का विधान है ,
इसमें माँ की नौ शक्तियों की पूजा अलग-अलग दिन की जाती है।
इस पर्व मे तीन प्रमुख हिंदू देवियों- पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के नौ स्वरुपों
श्री शैलपुत्री,
श्री ब्रह्मचारिणी,
श्री चंद्रघंटा,
श्री कुष्मांडा,
श्री स्कंदमाता,
श्री कात्यायनी,
श्री कालरात्रि,
श्री महागौरी, और
श्री सिद्धिदात्री का पूजन विधि विधान से किया जाता है।
" प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्माचारिणी !
तृतीय चंद्रघण्टेति कुष्माण्डेति चतुर्थकम् !
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च !
सप्तमं कालरात्रि महागौरीति चाऽष्टम् !
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिताः ! "
इनकी आराधना करने से कई प्रकार की गुप्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं।
इन दिनों किए जाने वाले टोने टोटके भी बहुत प्रभावशाली होते हैं, जिनके माध्यम से कोई भी मनोकामना पूर्ति कर सकता है।
किन्तु राह पर पड़े टोने टोटकों से स्वयं को बचाना भी अति आवश्यक होता है।
!! ॐ नमः शिवाय !!